विभाजन के संघर्ष की सकारात्मक कहानी है मिल्खा सिंह MILKHA SINGH

मिल्खा सिंह के कई उपनाम है हो भी क्यों न हो इंसान अपने कर्मो के फलस्वरूप नये नाम पा जाता है,पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने उन्हें दौड़ने पर नहीं उड़ने पर फ्लाइंग सिख का खिताब दिया था। विगत गुरुवार को उनकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आयी थी लेकिन उसी कोरोना ने उन्हें अंत में हरा दिया। मिल्खा सिंह भारत-पाक विभाजन में अपना सब कुछ खोने वाले में से एक थे यह गुस्सा उनका पूरे जीवन में रहा क्योंकि उन्होंने विभाजन में माता-पिता और भाई-बहनों को खोया।

पाकिस्तान से भारत लौटे तो यहाँ भी संघर्ष का नया दौर शुरू हुआ नई दिल्ली में जूते पॉलिश करने से लेकर उन्होंने संघर्षों के सभी पड़ावों को पार किया। बात 1960 के दशक की है मिल्खा सिंह रोम ओलिम्पिक में पदक से चूक गये थे उनके दिल में इसका बहुत मलाल था। उसी दौरान उन्हें पाकिस्तान में आयोजित इंटरनेशनल एथलीट कंपीटिशन में जाने का निमंत्रण मिला, विभाजन के दर्द ने उन्हें वहाँ जाने के लिये मना सा कर दिया लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बात को समझ लिया और उन्हें किसी तरह पाकिस्तान जाने के लिये मना लिया।

पाकिस्तान में अब्दुल खालिक के नाम को दौड़ के मामले में हीरो माना जाता था लेकिन मिल्खा सिंह ने पूरे स्टेडियम के दवाब में उड़ करके इस जीत को अपना नाम दे दिया। स्टेडियम में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति भी इस दौड़ को देख रहे थे उन्होंने मिल्खा सिंह को अपने पास बुलाकर कहा आज तुम दौड़े नहीं हो उड़े हो,उन्होंने ही मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख का नाम दिया। यूँ तो मिल्खा सिंह के नाम पर कई रिकार्ड दर्ज है लेकिन उन रिकार्डो से ज्यादा कीमती उनके जीवन का संघर्ष का है,नहीं सोचिये जिसने अपना सब कुछ कच्ची उम्र में ही खो दिया हो उसके पास जीने की वजह क्या रह जाती है।

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