Saturday, January 22, 2022
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UP: नीतियों के नीचे दब गयी उत्तर प्रदेश में स्वच्छ हवा की चाहत

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सारी दुनिया में भारत के वायु प्रदूषण के चर्चे हैं। स्थानीय मीडिया से लेकर वैश्विक मीडिया तक सभी जगह भारत में प्रदूषित और दम घोंटू हवा से जुड़ी खबरें अटी पड़ी हैं लेकिन भारत में जिन विभागों पर हवा की गुणवत्ता सुधारने की जिम्मेवारी है, वो ही इसे लेकर गंभीर नहीं हैं। केंद्र सरकार ने जनवरी 2019 में, देश की वायु गुणवत्ता में युद्ध स्तर पर सुधार करने के इरादे से देश का पहला राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) शुरू किया था।

जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, उनमें 132 शहरों में 2017 के स्तर के सापेक्ष 2024 तक PM2.5 के स्तर को 20% से 30% तक कम करना था। इस कार्यक्रम की घोषणा के तीन साल पूरा होने पर सेन्टर फाॅर रिसर्च आन इनर्जी एण्ड क्लीन एयर (सीआरईए) ने अपनी रिपोर्ट “ट्रेसिंग द हेज़ी एयर: प्रोग्रेस रिपोर्ट ऑन नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम” में दावा किया है कि प्रगति प्रतिगामी और निम्नस्तरीय है। उत्तर प्रदेश समुद्री किनारों से अछूता राज्य है। गंगा जमुना के दोआब के क्षेत्र उत्तर प्रदेश में औद्योगिक नियमावली और उसका अनुपालन दोनों ही बहुत ढीला ढाला है।

इन कमजोर नीतियों और वायु गुणवत्ता को जांचने के अपूर्ण साधन उत्तर प्रदेश को वायु प्रदूषण के दृष्टिकोण से खराब राज्यों की श्रेणी में रख देता है। यह भारत के सबसे प्रदूषित राज्यों में से एक है। सबसे प्रदूषित राज्यों में शामिल होने के साथ साथ उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य भी है जहां वायु गुणवत्ता सुधारने के लिहाज से महाराष्ट्र के बाद नॉन एटेनमेन्ट शहरों की संख्या सर्वाधिक है।

उत्तर प्रदेश में कई ऐसे शहर हैं जो लगातार पांच वर्षों से नेशनल एंबिएण्ट एयर क्वालिटी स्टैण्डर्ड (एनएएक्यूएस) द्वारा पीएम10/पीएम 2.5 के लिए निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। रिपोर्ट के लेखक सुनील दहिया का कहना है कि “शहरों के लिए निर्धारित राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और क्लीन एयर एक्शन प्लान बहुत क्रांतिकारी दस्तावेज थे। उम्मीद की जा रही थी कि लगातार खराब होती हवा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए इसे और समावेशी तथा प्रभावी बनाकर लागू किया जाएगा। इसके लिए जरूरी होने पर और अधिक शोध किया जाएगा लेकिन दुर्भाग्य से हर प्रकार की निर्धारित तिथि बीत गयी लेकिन उत्तर प्रदेश में कुछ खास हो नहीं पाया।

उत्तर प्रदेश में राज्य और क्षेत्रीय स्तर पर उत्सर्जन सूची, स्रोत विभाजन अध्ययन अब तक पूरे नहीं किए गए है।” सुनील दहिया आगे कहते हैं कि ” अनपरा को छोड़ दें राज्य के बाकी शहरों में वायु प्रदूषण से निपटने के जो एक्शन प्लान बनाये गये हैं, वो एक दूसरे की नकल करके बनाये गये से लगते हैं। ऐसा इसलिए दिखता है क्योंकि वायु प्रदूषण के स्रोतों को ठीक से पता लगाने का प्रयास नहीं किया गया है।” सीआरईए के द्वारा जो रिपोर्ट तैयार की गयी है उसमें सूचना अधिकार के तहत संबंधित विभागों से ही सूचना प्राप्त करके उसका विश्लेषण किया गया है।

इसके अलावा रिपोर्ट में संसदीय कार्यवाही, अन्य संस्थानोंं की रिपोर्ट तथा जन सामान्य में उपलब्ध आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया गया है। रिपोर्ट में इस बात को प्रमुखता से उभारा गया है कि एनसीएपी द्वारा शहरों के लिए तय किये गये एक्शन प्लान के अलावा राज्यों के लिए, क्षेत्रों के लिए और सीमा के दोनों ओर के लिए एक्शन प्लान पर कोई अमल नहीं किया गया है।

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